शिव बहादुर सिंह भदौरिया । Shiv Bahadur Singh Bhadauria

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Shiv Bahadur Singh Bhadauria

Baith lein kuch der aao

​बैठ लें
कुछ देर, आओ

झील तट पत्थर-शिला पर
लहर कितना तोड़ती है
लहर कितना जोड़ती है

देख लें
कुछ देर, आओ

पाँव पानी में हिलाकर
मौन कितना तोड़ता है
मौन कितना जोड़ता है

तौल लें
औकात अपनी
दृष्टियों को फिर मिलाकर

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शिव बहादुर सिंह भदौरिया । Shiv Bahadur Singh Bhadauria

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Shiv Bahadur Singh Bhadauria

Pakke Ghar Mein Kachche Rishte by Shiv Bahadur Singh Bhadauria

​पुरखा पथ से
पहिये रथ से
मोड़ रहा है गाँव

पूरे घर में
ईटें-पत्थर
धीरे-धीरे
छानी-छप्पर
छोड़ रहा है गाँव

ढीले होते
कसते-कसते
पक्के घर में
कच्चे रिश्ते
जोड़ रहा है गाँव

इससे उसको
उसको इससे
और न जाने
किसको किससे
तोड़ रहा है गाँव

गरमी हो बरखा
या जाड़ा
सबके आँगन
एक अखाड़ा
गोड़ रहा है गाँव