राज़ी अख़्तर शौक़ | Razi Akhtar Shauq

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ये कौन डूब गया और उभर गया मुझमें
ये कौन साये की सूरत गुज़र गया मुझमें

ये किसके सोग में शोरीदा हाल फिरता हूँ
वो कौन शख्स था ऐसा कि मर गया मुझमें

वो आदमी की जो पत्थर था जी रहा है अभी
जो आईना था वो बिखर गया मुझमें

​वो साथ था तो अजब धूप छाँव रहती थी
बस अब तो एक ही मौसम उतर गया मुझमें

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