परवेज़ बाग़ी | Parvez Baghi

Standard

पुरखों की रवायत है इसे तुम भी निभाओ
प्यासों को समंदर से बहुत दूर बसाओ

यूँ फ़िक्र में हर शख़्स की खुद को न घुलाओ
जीना है तो फिर दिल को भी पत्थर का बनाओ

ये याद रहे ज़ुल्म की हद होती है यारों
तुम हमको सताओ मगर इतना न सताओ

हर ख़्वाब-ऐ-कोहन तिश्ना-ऐ-तस्वीर है जब तक
तुम कोई नया ख़्वाब न लोगों को दिखाओ

जागे हुए सोने पे रज़ामंद नहीं हैं
सोये हुए लोगों को न ‘परवेज़’ जगाओ

* ख़्वाब-ऐ-कोहन – पुराना ख़्वाब
** तिश्ना-ऐ-तस्वीर – पूरा होने को प्यासा

Parvez Baghi

Parvez Baghi