हसरत मोहानी । Hasrat Mohani

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Ghazal by Hasrat Mohani

Hasrat Mohani

भुलाता लाख हुँ लेकिन बराबर याद आते हैं
इलाही, तर्के-उल्फ़त पर वो क्यों कर याद आते हैं

न छेड़ ऐ हमनशीं कैफ़ियते-सहबा के अफ़साने
शराब-ऐ-बेखुदी के मुझको सागर याद आते हैं

रहा करते हैं क़ैद-ऐ-होश में ऐ वाए-नाकामी
वो दश्त-ऐ-ख़ुद-फ़रामोशी के चक्कर याद आते हैं

नहीं आती तो याद उनकी महीनों तक नहीं आती
मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं

हक़ीक़त खुल गई हसरत तिरे तर्के-मोहब्बत की
तुझे तो अब वो पहले से भी बढ़कर याद आते हैं