बाक़ी सिद्दीक़ी | Baqi Siddqui

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तुम कब थे क़रीब इतने मैं कब दूर रहा हूँ
छोड़ो न करो बात की मैं तुमसे ख़फ़ा हूँ

रहने दो कि अब तुम भी मुझे पढ़ न सकोगे
बरसात में काग़ज़ की तरह भीग गया हूँ

सौ बार गिरह दे के किसी आस ने जोड़ा
सौ बार मैं धागे की तरह टूट चूका हूँ

जाएगा जहाँ तू मेरी आवाज़ सुनेगा
मैं चोर की मानिंद तेरे दिल में छुपा हूँ

मंज़िल का पता जिसने दिया था मुझे बाक़ी
उस शख्स़ से रस्ते में कई बार मिला हूँ

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