अख़्तर नज़्मी । Akhtar Nazmi

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Ghazal by Akhtar Nazmi

Ghazal by Akhtar Nazmi

जो भी मिल जाता है घर बार को दे देता हूँ।
या किसी और तलबगार को दे देता हूँ।

धूप को दे देता हूँ तन अपना झुलसने के लिये
और साया किसी दीवार को दे देता हूँ।

जो दुआ अपने लिये मांगनी होती है मुझे
वो दुआ भी किसी ग़मख्वार को दे देता हूँ।

मुतमइन अब भी अगर कोई नहीं है, न सही
हक़ तो मैं पहले ही हक़दार को दे देता हूँ।

जब भी लिखता हूँ मैं अफ़साना यही होता है
अपना सब कुछ किसी किरदार को दे देता हूँ।

ख़ुद को कर देता हूँ कागज़ के हवाले अक्सर 
अपना चेहरा कभी अख़बार को दे देता हूँ ।

मेरी दुकान की चीजें नहीं बिकती नज़्मी 
इतनी तफ़्सील ख़रीदार को दे देता हूँ।