हफ़ीज़ जौनपुरी | Hafeez Jaunpuri

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Hafeez Jaunpuri

Hafeez Jaunpuri

​बैठ जाता हूँ जहाँ छाँव घनी होती है
हाए क्या चीज़ ग़रीब-उल-वतनी होती है

नहीं मरते हैं तो ईज़ा नहीं झेली जाती
और मरते हैं तो पैमाँ-शिकनी होती है

दिन को एक नूर बरसता है मेरी तुर्बत पर
रात को चादर-ए-महताब तनी होती है

मैकशों को न कभी फिक्र कम-ओ-बेश रही
ऐसे लोगों की तबीअत भी ग़नी होती है

हूक उठती है अगर ज़ब्त-ए-फुगाँ करता हुँ
साँस रुकती है तो बरछी की अनी होती है