शादी शिराज़ी । Shaadi Shirazi


Shaadi Shirazi

I heard a padshah giving orders to kill a prisoner.
The helpless fellow began to insult the king on that occasion of despair,
with the tongue he had,
and to use foul expressions according to the saying:
Who washes his hands of life
Says whatever he has in his heart.

When a man is in despair
his tongue becomes long
and he is like a vanquished cat assailing a dog.

In time of need,
when flight is no more possible,
The hand grasps the point of the sharp sword. When the king asked what he was saying, a good-natured vezier replied:
‘My lord, he says: Those who bridle their anger and forgive men;
for Allah loveth the beneficent.’

The king, moved with pity,
forbore taking his life but another vezier,
the antagonist of the former, said:
‘Men of our rank ought to speak nothing but the truth in the presence of padshahs.
This fellow has insulted the king and spoken unbecomingly.’

The king, being displeased with these words, said:
‘That lie was more acceptable to me than this truth thou hast uttered because the former proceeded from a conciliatory disposition and the latter from malignity; and wise men have said: “A falsehood resulting in conciliation is better than a truth producing trouble.”‘

He whom the shah follows in what he says,
It is a pity if he speaks anything but what is good.
The following inscription was upon the portico of the hall of Feridun:
O brother, the world remains with no one.
Bind the heart to the Creator, it is enough.
Rely not upon possessions and this world
Because it has cherished many like thee and slain them.
When the pure soul is about to depart,
What boots it if one dies on a throne
or on the ground?

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना । Sarveshvar Dayal Saxena


Sarveshwar Dayal Saxena

जब सब बोलते थे
वह चुप रहता था
जब सब चलते थे
वह पीछे हो जाता था
जब सब खाने पर टूटते थे
वह अलग बैठा टूँगता रहता था
जब सब निढाल हो सो जाते थे
वह शून्य में टकटकी लगाए रहता था

लेकिन जब गोली चली तब
सबसे पहले वही मारा गया

इब्नबतूता पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
घुस गई थोड़ी कान में

कभी नाक को, कभी कान को
मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता
उड़ते उड़ते जूता उनका
जा पहुँचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दुकान में

सुभद्राकुमारी चौहान । Subhadrakumari Chauhan



यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।।

ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली।
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली।।

तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता।
उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता।।

वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता।
अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता।।

बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता।
माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता।।

तुम आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे।
ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे।।

तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता।
और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता।।

तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती।
जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं।।

इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे।
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।।

पाब्लो नेरूदा । Pablo Neruda


100 Love Sonnets

Translated English version by Mark Eisner

I don ’t love you as if you were a rose of salt, topaz,
or arrow of carnations that propagate fire:
I love you as one loves certain obscure things, secretly,
between the shadow and the soul.

I love you as the plant that doesn’t bloom but
carries the light of those flowers, hidden, within itself,
and thanks to your love the tight aroma that arose from the earth lives dimly in my body.

I love you without knowing how,
or when, or from where I love you directly without problems or pride:
I love you like this because I don’t know
any other way to love,
except in this form in which
I am not nor are you,
so close that your hand upon my chest is mine,
so close that your eyes close with my dreams

Original Spanish version by Neruda

No te amo como si fueras rosa de sal, topacio
o flecha de claveles que propagan el fuego:
te amo como se aman ciertas cosas oscuras,
secretamente, entre la sombra y el alma.

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गीत चतुर्वेदी । Geet Chaturvedi


Geet Chaturvedi

तुम इतनी देर तक घूरते रहे अंधेरे को
कि तुम्हारी पुतलियों का रंग काला हो गया
किताबों को ओढा इस तरह
कि शरीर कागज़ हो गया

कहते रहे
मौत आए तो इस तरह
जैसे पानी को आती है
वह बदल जाता है भाप में
आती है पेड़ को
वह दरवाज़ा बन जाता है
जैसे आती है आग को
वह राख बन जाती है

तुम गाय का थान बन जाना
दूध बनकर बरसना
भाप बनकर चलाना बड़े-बड़े इंजन
भात पकाना
जिस रास्ते को हमेशा
बंद रहने का शाप मिला
उस पर दरवाज़ा बनकर खुलना
राख से मांजना
बीमार माँ की पलंग के नीचे रखे बासन
तुम एक तीली जलाना
उसे देर तक घूरना

अमृता प्रीतम । Amrita Pritam


Amrita Pritam

मैं तैनू फ़िर मिलांगी
कित्थे? किस तरह?
पता नई
शायद तेरे ताखियल दी चिंगारी बण के
तेरे केनवास ते उतरांगी
जा खोरे तेरे केनवास दे उत्ते
इक रह्स्म्यी लकीर बण के
खामोश तैनू तक्दी रवांगी
जा खोरे सूरज दी लौ बण के
तेरे रंगा विच घुलांगी
जा रंगा दिया बाहवां विच बैठ के
तेरे केनवास नु वलांगी

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औगडेन नैश । Ogden Nash


Ogden Nash

To keep your marriage brimming
With love in the loving cup,
Whenever you’re wrong, admit it;
Whenever you’re right, shut up