अमृता प्रीतम । Amrita Pritam

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Amrita Pritam

मैं तैनू फ़िर मिलांगी
कित्थे? किस तरह?
पता नई
शायद तेरे ताखियल दी चिंगारी बण के
तेरे केनवास ते उतरांगी
जा खोरे तेरे केनवास दे उत्ते
इक रह्स्म्यी लकीर बण के
खामोश तैनू तक्दी रवांगी
जा खोरे सूरज दी लौ बण के
तेरे रंगा विच घुलांगी
जा रंगा दिया बाहवां विच बैठ के
तेरे केनवास नु वलांगी

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सुदर्शन फ़ाकिर । Sudarshan Fakir

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Ye daulat bhi le lo by Sudarshan Fakir

Sudarshan Fakir

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो 
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी 
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन 
वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी 

मुहल्ले की सबसे निशानी पुरानी 
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी 
वो नानी की बातों में परियों का डेरा 
वो चहरे की झुरिर्यों में सदियों का फेरा 
भुलाये नहीं भूल सकता है कोई 
वो छोटी सी रातें वो लम्बी कहानी 

कड़ी धूप में अपने घर से निकलना 
वो चिड़िया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना 
वो गुड़िया की शादी में लड़ना झगड़ना 
वो झूलों से गिरना वो गिर के सम्भलना 
वो पीतल के छल्लों के प्यारे से तोहफ़े 
वो टूटी हुई चूड़ियों की निशानी 

कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जाना 
घरोंदे बनाना बना के मिटाना 
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी 
वो ख़्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी 
न दुनिया का ग़म था न रिश्तों के बंधन 
बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िंदगानी

इब्ने इंशा । Ibne Insha

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Ibne Insha

Ibne Insha

हम घूम चुके बस्ती बन में
एक आस का फाँस लिए मन में
कोई साजन हो, कोई प्यारा हो
कोई दीपक हो कोई तारा हो
जब जीवन-रात अधूरी हो
एक बार कहो तुम मेरी हो

जब सावन बादल छाए हों
जब फागुन फूल खिलाये हों
जब चंदा रूप लुटाता हो
जब सूरज धूप नहाता हो
या शाम ने बस्ती घेरी हो
एक बार कहो तुम मेरी हो
हाँ दिल का दामन फैला है

क्यूँ गोरी का दिल मैला है
हम कब तक पीत के धोखे में
तुम कब तक दूर झरोखे में
कब दीद से दिल की सेरी हो
एक बार कहो तुम मेरी हो

क्या झगड़ा सूद-ख़सारे का
ये काज नहीं बंजारे का
सब सोना रूपा ले जाए
सब दुनिया, दुनिया ले जाए
तुम एक मुझे बहुतेरी हो
एक बार कहो तुम मेरी हो