अज्ञेय । Agyeya

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Agyeya

साँप!
तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया।

एक बात पूछूँ–(उत्तर दोगे?)
तब कैसे सीखा डँसना–
विष कहाँ पाया?

अजित कुमार । Ajit Kumar

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Ajit Kumar

मेरे साथ जुड़ी हैं
कुछ मेरी ज़रूरतें उनमें एक तुम हो।

चाहूँ या न चाहूँ:
जब ज़रूरत हो तुम,
तो तुम हो मुझ में और पूरे अन्त तक रहोगी।

इससे यह सिद्ध कहाँ होता
कि मैं भी तुम्हारे लिए उसी तरह ज़रूरी।

देखो न!
आदमी को हवा चाहिए ज़िन्दा रहने को
पर हवा तो आदमी की अपेक्षा नहीं करती,
वह अपने आप जीवित है।

डाली पर खिला था एक फूल,
छुआ तितली ने, रस लेकर उड़ गई।
पर फूल वह तितली मय हो चुका था।

झरी पँखुरी एक: तितली।
फिर दूसरी भी: तितली।
फिर सबकी सब: तितली।
छूँछें वृन्त पर बाक़ी बची ख़ुश्की जो: तितली।

कोमलता अंतिम क्षण तक यह बताकर ही गई:
‘मैं वहाँ भी हूँ, जहाँ मेरी कोई ज़रूरत नहीं।’

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना । Sarveshvar Dayal Saxena

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Sarveshwar Dayal Saxena

जब सब बोलते थे
वह चुप रहता था
जब सब चलते थे
वह पीछे हो जाता था
जब सब खाने पर टूटते थे
वह अलग बैठा टूँगता रहता था
जब सब निढाल हो सो जाते थे
वह शून्य में टकटकी लगाए रहता था

लेकिन जब गोली चली तब
सबसे पहले वही मारा गया

इब्नबतूता पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
घुस गई थोड़ी कान में

कभी नाक को, कभी कान को
मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता
उड़ते उड़ते जूता उनका
जा पहुँचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दुकान में

सुभद्राकुमारी चौहान । Subhadrakumari Chauhan

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SUBHADRAKUMARI CHAUHAN

यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।।

ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली।
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली।।

तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता।
उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता।।

वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता।
अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता।।

बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता।
माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता।।

तुम आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे।
ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे।।

तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता।
और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता।।

तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती।
जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं।।

इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे।
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।।

गीत चतुर्वेदी । Geet Chaturvedi

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Geet Chaturvedi

तुम इतनी देर तक घूरते रहे अंधेरे को
कि तुम्हारी पुतलियों का रंग काला हो गया
किताबों को ओढा इस तरह
कि शरीर कागज़ हो गया

कहते रहे
मौत आए तो इस तरह
जैसे पानी को आती है
वह बदल जाता है भाप में
आती है पेड़ को
वह दरवाज़ा बन जाता है
जैसे आती है आग को
वह राख बन जाती है

तुम गाय का थान बन जाना
दूध बनकर बरसना
भाप बनकर चलाना बड़े-बड़े इंजन
भात पकाना
जिस रास्ते को हमेशा
बंद रहने का शाप मिला
उस पर दरवाज़ा बनकर खुलना
राख से मांजना
बीमार माँ की पलंग के नीचे रखे बासन
तुम एक तीली जलाना
उसे देर तक घूरना

औगडेन नैश । Ogden Nash

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Ogden Nash

To keep your marriage brimming
With love in the loving cup,
Whenever you’re wrong, admit it;
Whenever you’re right, shut up

माखनलाल चतुर्वेदी । Makhanlal Chaturvedi

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Makhanlal Chaturvediचाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं, सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाऊँ,
चाह नहीं, देवों के सिर पर, चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ!

मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक