100th Post | 100 कवि

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Mukarrar's 100th Post

Mukarrar’s 100th Post

Extending a big thank you to all of you who have been a part of this wonderful journey. This is just the beginning and we will work to feature more and more gems from world poetry on this platform. Gratitude for being a part of this, you make it worthwhile. Keep reading, keep writing. 

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द्वारिकप्रसाद माहेश्वरी । Dwarika Prasad Maheshwari

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उठो लाल अब आँखे खोलो
पानी लाई हूँ मुँह धो लो

बीती रात कमल दल फूले
उनके ऊपर भंवरे डोले

चिड़िया चहक उठी पेड़ पर
बहने लगी हवा अति सुंदर

नभ में न्यारी लाली छाई
धरती ने प्यारी छवि पाई

भोर हुई सूरज उग आया
जल में पड़ी सुनहरी छाया

ऐसा सुंदर समय न खोओ
मेरे प्यारे अब मत सोओ

धर्मवीर भारती । Dharmavir Bharti

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Dharmvir Bharti

Dharmvir Bharti


​चेक बुक हो पीली या लाल
दाम सिक्के हों या शोहरत
कह दो उनसे
जो ख़रीदने आये हों तुम्हें
हर भूखा आदमी बिकाऊ नहीं होता है

भारत भुषण अग्रवाल । Bharat Bhushan Agrawal

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Bharat Bhushan Agrawal

Bharat Bhushan Agrawal

​आज जब घर पहुंचा शाम को
तो बडी अजीब घटना हुई
मेरी ओर किसी ने भी कोई ध्यान ही न दिया।
चाय को न पूछा आके पत्नी ने
बच्चे भी दूसरे ही कमरे में बैठे रहे
नौकर भी बडे ढीठ ढंग से झाडू लगाता रहा
मानो मैं हूँ ही नहीं-

तो क्या मैं हूँ ही नहीं?
और तब विस्मय के साथ यह बोध मन में जगा
अरे, मेरी देह आज कहां है?
रेडियो चलाने को हुआ-हाथ गायब हें
बोलने को हुआ-मुंह लुप्त है
दृष्टि है परन्तु हाय! आंखों का पता नहीं
सोचता हूँ- पर सिर शायद नदारद है

तो फिर-तो फिर मैं भला घर कैसे आया हूँ
और तब धीरे-धीरे ज्ञान हुआ
भूल से मैं सिर छोड आया हूँ दफ्तर में
हाथ बस में ही टंगे रह गए
आंखें जरूर फाइलों में ही उलझ गईं
मुंह टेलीफोन से ही चिपटा सटा होगा
और पैर हो न हो क्यू में रह गए हैं-
तभी तो मैं आज आया हूँ विदेह ही!
देहहीन जीवन की कल्पना तो
भारतीय संस्कृति का सार है
पर क्या उसमें यह थकान भी शामिल है
जो मुझ अंगहीन को दबोचे ही जाती है?

अजित कुमार । Ajit Kumar

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Ajit Kumar

मेरे साथ जुड़ी हैं
कुछ मेरी ज़रूरतें उनमें एक तुम हो।

चाहूँ या न चाहूँ:
जब ज़रूरत हो तुम,
तो तुम हो मुझ में और पूरे अन्त तक रहोगी।

इससे यह सिद्ध कहाँ होता
कि मैं भी तुम्हारे लिए उसी तरह ज़रूरी।

देखो न!
आदमी को हवा चाहिए ज़िन्दा रहने को
पर हवा तो आदमी की अपेक्षा नहीं करती,
वह अपने आप जीवित है।

डाली पर खिला था एक फूल,
छुआ तितली ने, रस लेकर उड़ गई।
पर फूल वह तितली मय हो चुका था।

झरी पँखुरी एक: तितली।
फिर दूसरी भी: तितली।
फिर सबकी सब: तितली।
छूँछें वृन्त पर बाक़ी बची ख़ुश्की जो: तितली।

कोमलता अंतिम क्षण तक यह बताकर ही गई:
‘मैं वहाँ भी हूँ, जहाँ मेरी कोई ज़रूरत नहीं।’

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना । Sarveshvar Dayal Saxena

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Sarveshwar Dayal Saxena

जब सब बोलते थे
वह चुप रहता था
जब सब चलते थे
वह पीछे हो जाता था
जब सब खाने पर टूटते थे
वह अलग बैठा टूँगता रहता था
जब सब निढाल हो सो जाते थे
वह शून्य में टकटकी लगाए रहता था

लेकिन जब गोली चली तब
सबसे पहले वही मारा गया

इब्नबतूता पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
घुस गई थोड़ी कान में

कभी नाक को, कभी कान को
मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता
उड़ते उड़ते जूता उनका
जा पहुँचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दुकान में