गुलज़ार । Gulzar

Standard
Gulzar

Gulzar

सहमा सहमा डरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है

काई सी जम गई है आँखों पर
सारा मंज़र हरा सा रहता है

एक पल देख लूँ तो उठता हूँ
जल गया घर ज़रा सा रहता है

सर में जुम्बिश ख़याल की भी नहीं
ज़ानुओं पर धरा सा रहता है

Advertisements

सिद्दीक़ मुजीब । Siddique Mujeeb

Standard
Siddique Mujeeb

Siddique Mujeeb

One of the most remarkable ghazals by Siddique Mujeeb saheb, this work makes him stand tall in the world of Urdu poetry. He has penned numerous other beautiful ghazals. The meter is melodious and instantly echoes through one’s heart. Read the full ghazal and do not forget to share it with your friends and loved ones who appreciate poetry.

आग देखूँ कभी जलता हुआ बिस्तर देखूँ
रात आए तो यहीं ख़्वाब-ए-मुकर्रर देखूँ

एक बेचैन समुंदर है मिरे जिस्म में क़ैद
टूट जाए जो ये दीवार तो मंज़र देखूँ

रात गहरी है बहुत राज़ न देगी अपना
मैं तो सूरज भी नहीं हूँ कि उतर कर देखूँ

ख़ुद पे क्या बीत गई इतने दिनों में तुझ बिन
ये भी हिम्मत नहीं अब झाँक के अंदर देखूँ

कोई इस दौर में एलान-ए-नबूवत करता
आरज़ू थी कि ख़ुदा-साज़ पयम्बर देखूँ

एक सन्नाटा हूँ पत्थर के जिगर में पैवस्त
मैं कोई बुत तो नहीं हूँ कि निकल कर देखूँ

यूँ नशे से कभी दो चार तिरा ग़म हो कि मैं
बंद आँखों से खुली आँख का मंज़र देखूँ

ओढ़ कर ख़ाक ‘मुजीबी’ सुनूँ दुश्नाम-ए-जहाँ
ये तमाशा ही किसी रोज़ मियाँ कर देखूँ

अल्लामा इक़बाल । Allama Iqbal

Standard
Allama Iqbal

Allama Iqbal


आता है याद मुझको गुज़रा हुआ ज़माना
वो बाग़ की बहारें, वो सब का चह-चहाना

आज़ादियाँ कहाँ वो, अब अपने घोसले की
अपनी ख़ुशी से आना अपनी ख़ुशी से जाना

लगती हो चोट दिल पर, आता है याद जिस दम
शबनम के आँसुओं पर कलियों का मुस्कुराना

वो प्यारी-प्यारी सूरत, वो कामिनी-सी मूरत
आबाद जिस के दम से था मेरा आशियाना

दुष्यंत कुमार । Dushyant Kumar

Standard
Dushyant Kumar

Dushyant Kumar

​घंटियों की आवाज़ कानों तक पहुँचती है
एक नदी जैसे दहानों तक पहुँचती है

अब इसे क्या नाम दें, ये बेल देखो तो
कल उगी थी आज शानों तक पहुँचती है

खिड़कियां, नाचीज़ गलियों से मुख़ातिब है
अब लपट शायद मकानों तक पहुँचती है

आशियाने को सजाओ तो समझ लेना,
बरक कैसे आशियानों तक पहुँचती है

तुम हमेशा बदहवासी में गुज़रते हो,
बात अपनों से बिगानों तक पहुँचती है

सिर्फ़ आंखें ही बची हैं चँद चेहरों में
बेज़ुबां सूरत, जुबानों तक पहुँचती है

अब मुअज़न की सदाएं कौन सुनता है
चीख़-चिल्लाहट अज़ानों तक पहुँचती है

कैफ़ी आज़्मी । Kaifi Azmi

Standard
Kaifi Azmi

Kaifi Azmi

वो कभी धूप कभी छाँव लगे
मुझे क्या-क्या न मेरा गाँव लगे

किसी पीपल के तले जा बैठे
अब भी अपना जो कोई दाँव लगे

एक रोटी के ताक़ब् में चला हूँ इतना
की मेरा पाँव किसी और ही का पाँव लगे

रोटी-रोज़ी की तलब जिसको कुचल देती है
उसकी ललकार भी एक सहमी हुई म्याँव लगे

जैसे देहात में लू लगती है चरवाहों को
बम्बई में यूँ ही तारों की हँसी छाँव लगे

ऐनी सेक्सटन । Anne Sexton

Quote

The complete poems by Anne Sexton

My faith is a great weight hung on a small wire, as doth the spider hang her baby on a thin web, as doth the vine, twiggy and wooden,
hold up grapes like eyeballs,
as many angels dance on the head of a pin.
God does not need too much wire to keep
Him there, just a thin vein, with blood pushing back and forth in it, and some love.
As it has been said:
Love and a cough cannot be concealed.
Even a small cough.
Even a small love.
So if you have only a thin wire,
God does not mind.
He will enter your hands as easily
as ten cents used to bring forth a Coke.