अल्लामा इक़बाल । Allama Iqbal

Standard
Allama Iqbal

Allama Iqbal


आता है याद मुझको गुज़रा हुआ ज़माना
वो बाग़ की बहारें, वो सब का चह-चहाना

आज़ादियाँ कहाँ वो, अब अपने घोसले की
अपनी ख़ुशी से आना अपनी ख़ुशी से जाना

लगती हो चोट दिल पर, आता है याद जिस दम
शबनम के आँसुओं पर कलियों का मुस्कुराना

वो प्यारी-प्यारी सूरत, वो कामिनी-सी मूरत
आबाद जिस के दम से था मेरा आशियाना

Advertisements

दुष्यंत कुमार । Dushyant Kumar

Standard
Dushyant Kumar

Dushyant Kumar

​घंटियों की आवाज़ कानों तक पहुँचती है
एक नदी जैसे दहानों तक पहुँचती है

अब इसे क्या नाम दें, ये बेल देखो तो
कल उगी थी आज शानों तक पहुँचती है

खिड़कियां, नाचीज़ गलियों से मुख़ातिब है
अब लपट शायद मकानों तक पहुँचती है

आशियाने को सजाओ तो समझ लेना,
बरक कैसे आशियानों तक पहुँचती है

तुम हमेशा बदहवासी में गुज़रते हो,
बात अपनों से बिगानों तक पहुँचती है

सिर्फ़ आंखें ही बची हैं चँद चेहरों में
बेज़ुबां सूरत, जुबानों तक पहुँचती है

अब मुअज़न की सदाएं कौन सुनता है
चीख़-चिल्लाहट अज़ानों तक पहुँचती है

हसरत मोहानी । Hasrat Mohani

Standard

Ghazal by Hasrat Mohani

Hasrat Mohani

भुलाता लाख हुँ लेकिन बराबर याद आते हैं
इलाही, तर्के-उल्फ़त पर वो क्यों कर याद आते हैं

न छेड़ ऐ हमनशीं कैफ़ियते-सहबा के अफ़साने
शराब-ऐ-बेखुदी के मुझको सागर याद आते हैं

रहा करते हैं क़ैद-ऐ-होश में ऐ वाए-नाकामी
वो दश्त-ऐ-ख़ुद-फ़रामोशी के चक्कर याद आते हैं

नहीं आती तो याद उनकी महीनों तक नहीं आती
मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं

हक़ीक़त खुल गई हसरत तिरे तर्के-मोहब्बत की
तुझे तो अब वो पहले से भी बढ़कर याद आते हैं