सुख़नवरी

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उर्दू शेर ओ शायरी ने इस दुनिया के लिए वो काम किया है जो ज़माना-ऐ-क़दीम से लेकर हमारे मुस्तकबिल को रोशन करता रहेगा । इंसानियत की चेहराकुशाई करने का जो हुनर हमारे इस अदब में है उसकी मिसाल मिलना यक़ीनन नामुमकिन है । हज़ारहा मोतबर शायरों ने कई सदियों से इस अदब की ख़िदमत की है और इसे ज़माना-ऐ-ज़दीद के एहतियातन नया अम्ली जामा भी दिया है । मगर कुछ चुनिंदा शायरों के सिवा कई हुनरमंद शायरों का कलाम वक़्त की गर्द में कहीं पीछे ही रह गया ।

मुकर्रर उन्ही खूबसूरत ग़ज़लगो शायरों के बेइन्तेहा दिलकश कलाम से रूबरू कराने की एक अदना सी कोशिश भर है । हालांकि ये सारा कलाम कहीं न कहीं किताबों में दफ़्न ज़रूर है मगर डिजिटल ज़माने में अब किसे फुरसत है

“दिल ढूंढ़ता है फिर वही फुरसत के रात दिन,

बैठे रहे तस्सवुर-ऐ-जानाँ किये हुए ”

आइये मेरे साथ ग़ज़लों, नज़्मों और क़तआत की ख़ूबसूरत दुनिया में, आइये मिलते हैं उनसे जिन्होंने उर्दू शायरी को नवाज़ा ही नहीं बल्कि गुलज़ार भी रखा है ।

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